Hindi Grammar alankar full details with meaning, definition, kinds, and examples. Alankar is called the Figure of Speech in English.
अलंकार की परिभाषा :
अलंकार का शाब्दिक अर्थ ‘आभूषण‘ होता है-, जिस तरह किसी स्त्री की शोभा उसके आभूषण से होती हैं उसी प्रकार काव्य और कविता की शोभा भी अलंकार से होती है अर्थात जो किसी वस्तु को अलंकृत करे वह अलंकार कहलाती हैं।
अलंकार के प्रकार :
अलंकार को उनके गुणों के आधार पर तीन प्रकार में विभाजित किया गया है :-
- शब्दालंकार,
- अर्थालंकार,
- उभयालंकार

शब्दालंकार (Shabd Alankar)
जिस अलंकार में शब्दों को प्रयोग करने से चमत्कार हो जाता है और उन शब्दों की जगह पर समानार्थी शब्द को रखने से वो चमत्कार समाप्त हो जाये वहाँ शब्द अलंकार (Shabd Alankar – शब्दालंकार) होता है।
शब्दालंकार दो शब्दों से मिलकर बना होता है – शब्द + अलंकार, शब्द के दो रूप होते हैं – ध्वनी और अर्थ, ध्वनि के आधार पर शब्दालंकार की सृष्टी होती है। जब अलंकार किसी विशेष शब्द की स्थिति में ही रहे और उस शब्द की जगह पर कोई और पर्यायवाची शब्द के रख देने से उस शब्द का अस्तित्व न रहे उसे शब्दालंकार कहते हैं।
शब्दालंकार के प्रकार:-
अनुप्रास ( Yamak )अलंकार
जब समान व्यंजनों की आवृत्ति अर्थात उनके बार-बार प्रयोग से कविता में सौंदर्य की उत्पत्ति होती है तो व्यंजनों की इस आवृत्ति को अनुप्रास कहते हैं।
अनुप्रास शब्द अनु + प्रास शब्दों से मिलकर बना है। अनु का अर्थ है बार – बार , प्रास शब्द का अर्थ है वर्ण। अर्थात जो शब्द बाद में आए अथवा बार-बार आए वहां अनुप्रास अलंकार की संभावना होती है।
जिस जगह स्वर की समानता के बिना भी वर्णों की आवृत्ति बार-बार होती है वहां भी अनुप्रास अलंकार होता है।
जिस रचना में व्यंजन की आवृत्ति एक से अधिक बार हो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
अनुप्रास अलंकार के पांच भेद हैं:
- छेकानुप्रास
- वृत्यानुप्रास
- अंतानुप्रास
- लाटानुप्रास
- श्रुत्यानुप्रास
इनमें प्रथम दो का विशेष महत्व है। उनका परिचय निम्नलिखित है
छेकानुप्रास अलंकार किसे कहते हैं ?
जहां एक या अनेक वर्णों की केवल एक बार आवृत्ति हो जैसे –
” कानन कठिन भयंकर भारी। घोर हिमवारी बयारी। “
इस पद्यांश के पहले चरण में ‘ क ‘ तथा ‘ भ ‘ वर्णो की एवं दूसरे चरण में ‘ घ ‘ वर्ण की एक – एक बार आवृत्ति हुई है। अतः छेकानुप्रास है।
वृत्यानुप्रास अलंकार किसे कहते हैं ?
जहां एक या अनेक वर्णों की अनेक बार आवृत्ति हो जैसे –
“चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल – थल में “
यहां कोमल – वृत्ति के अनुसार ‘ च ‘ वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हुई है। अतः वृत्यनुप्रास अलंकार है।
लाटानुप्रास अलंकार किसे कहते हैं ?
जहाँ शब्द और वाक्यों की आवर्ती हो तथा प्रत्येक जगह पर अर्थ भी वही पर अन्वय करने पर भिन्नता आ जाये वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है। अथार्त जब एक शब्द या वाक्य खंड की आवर्ती उसी अर्थ में हो वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है।
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी के पात्र समर्थ,
तेगबहादुर, हाँ, वे ही थे गुरु-पदवी थी जिनके अर्थ।
अन्त्यानुप्रास अलंकार किसे कहते हैं ?
जहाँ किसी कविता के अंत में तुक मिलती हैं तो वहाँ पर अन्त्यानुप्रास अलंकार होता है।
“लगा दी किसने आकर आग।
कहाँ था तू संशय के नाग?”
श्रुत्यानुप्रास अलंकार किसे कहते हैं ?
जहाँ किसी कविता मैं कानों को मधुर लगने वाले वर्णों की आवर्ती होती हैं तो उसे श्रुत्यानुप्रास अलंकार कहते है।
“दिनान्त था, थे दीननाथ डुबते,
सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे।”
अनुप्रास अलंकार के उदाहरण:
- भुज भुजगेस की है संगिनी भुजंगिनी सी ( ‘ भ ‘ की आवृत्ति )
- तट तमाल तरूवर बहू छाए ( ‘त ‘ वर्ण की आवृत्ति बार – बार हो रही है )
- चारू चंद की चंचल किरणे ( ‘ च ‘ की आवृत्ति बार बार हो रही है )
- तुम मांस – हीन , तुम रक्तहीन हे अस्थि – शेष तुम अस्थिहीन ( सुमित्रानंदन पंत की कविता का अंश ) ( ‘त’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण अनुप्रास अलंकार है )
- ”कानन कठिन भयंकर भारी। घोर हिमवारी बयारी। ” ( ‘ क ‘ और ‘ भ ‘ वर्ण की आवृत्ति )
- “चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल – थल में ” – (‘ च ‘ वर्ण की आवृत्ति बार बार हो रही है। )
- “मधुप गुन – गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी।” ( ‘ग’ और ‘ क ‘ वर्ण की आवृत्ति बार बार हो रही है। )
- “घेर घेर घोर गगन ,शोभा श्री।” ( ‘ घ ‘ की आवृत्ति हुई है )
- “धूलि – धूसर , परस पाकर , सूरज की किरणों का।” ( ‘ ध ‘ और ‘ प ‘ वर्ण की आवृत्ति हुई है )
- “दुःख दूना ,सुरंग सुधियाँ सुहावनी ,कमजोर कांपती।” ( ‘ द ‘ और ‘ स ‘ वर्ण की आवृत्ति बार बार हो रही है। )
यमक ( Yamak ) अलंकार
जब किसी कविता या काव्य में एक ही शब्द का दो या दो से अधिक बार प्रयोग हो और हर बार उसका अर्थ भिन्न हो तो वहाँ यमक अलंकार होता है।
उदाहरण के लिए:
कनक कनक ते सौ गुनी , मादकता अधिकाय। या खाए बौराय जग , या पाए बौराय। ।
इस छंद में ‘ कनक ‘ शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है।
एक ‘ कनक ‘ का अर्थ है ‘ स्वर्ण ‘ और दूसरे का अर्थ है ‘ धतूरा ‘ इस प्रकार एक ही शब्द का भिन्न – भिन्न अर्थों में दो बार प्रयोग होने के कारण ‘ यमक अलंकार ‘ है।
यमक अलंकार के दो भेद हैं:
अभंग पद यमक अलंकार
जब किसी कविता या काव्य में किसी शब्द को बिना तोड़े मरोड़े एक ही रूप में अनेक बार भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग किया गया है , तब वह अभंग पद यमक कहलाता है। जैसे –
” जगती जगती की मुक प्यास। “
इस उदाहरण में जगती शब्द की आवृत्ति बिना तोड़े मरोड़े भिन्न-भिन्न अर्थों में १ ‘ जगती ‘ २ ‘ जगत ‘ ( संसार ) हुई है। अतः यह अभंग पद यमक का उदाहरण है।
सभंग पद यमक अलंकार
जब किसी कविता या काव्य में जोड़ – तोड़ कर एक जैसे वर्ण समूह( शब्द ) की आवृत्ति होती है , और उसे भिन्न-भिन्न अर्थों की प्रकृति होती है अथवा वह निरर्थक होता है , तब सभंग पद यमक होता है। जैसे –
” पास ही रे हीरे की खान , खोजता कहां और नादान?”
यहां ‘ ही रे ‘ वर्ण – समूह की आवृत्ति हुई है।
पहली बार वही ही + रे को जोड़कर बनाया है। इस प्रकार यहां सभंग पद यमक है।
अन्य उदाहरण
- “या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी। ।” ( अधरान – होठों पर , अधरा न – होठों पर नहीं )
- काली घटा का घमंड घटा । ( घटा – बादलों का जमघट , घटा – कम हुआ )
- माला फेरत जुग भया , फिरा न मन का फेर। कर का मनका डारि दे , मन का मनका फेर। ( मनका – माला का दाना , मनका – हृदय का )
पुनरुक्ति ( Punrukti ) अलंकार
पुनरुक्ति अलंकार दो शब्दों पुन: +उक्ति से मिलकर बना है। जब किसी कविता या काव्य में कोई शब्द दो बार दोहराया जाता है वहाँ पर पुनरुक्ति अलंकार होता है।
विप्सा ( Vipsa ) अलंकार
जब आदर, हर्ष, शोक, विस्मयादिबोधक आदि भावों को प्रभावशाली रूप से व्यक्त करने के लिए शब्दों की पुनरावृत्ति को ही विप्सा अलंकार कहते है।
मोहि-मोहि मोहन को मन भयो राधामय।
राधा मन मोहि-मोहि मोहन मयी-मयी।।
वक्रोक्ति ( Vakrokti ) अलंकार
जहाँ पर वक्ता के द्वारा बोले गए शब्दों का श्रोता अलग अर्थ निकाले उसे वक्रोक्ति अलंकार कहते है।
वक्रोक्ति अलंकार के भेद :-
- काकु वक्रोक्ति अलंकार
- श्लेष वक्रोक्ति अलंकार
काकु वक्रोक्ति अलंकार
जब वक्ता के द्वारा बोले गये शब्दों का उसकी कंठ ध्वनी के कारण श्रोता कुछ और अर्थ निकाले वहाँ पर काकु वक्रोक्ति अलंकार होता है।
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू।
श्लेष वक्रोक्ति अलंकार
जहाँ पर श्लेष की वजह से वक्ता के द्वारा बोले गए शब्दों का अलग अर्थ निकाला जाये वहाँ श्लेष वक्रोक्ति अलंकार होता है।
को तुम हौ इत आये कहाँ घनस्याम हौ तौ कितहूँ बरसो।
चितचोर कहावत है हम तौ तहां जाहुं जहाँ धन सरसों।।
श्लेष ( Shlesh ) अलंकार
अगर हम श्लेष का अर्थ देखे तो वो है चिपकाना , जहां किसी कविता या काव्य में शब्द तो एक बार प्रयुक्त किया जाए पर उसके एक से अधिक अर्थ निकले तो वहाँ श्लेष अलंकार होता है। जैसे –
उदाहरण
” जो रहिम गति दीप की , कुल कपूत की सोय।
बारे उजियारे करे , बढ़े अंधेरो होय। । “
यहां ‘ दीपक ‘ और ‘ कुपुत्र ‘ का वर्णन है। ‘ बारे ‘ और ‘ बढे ‘ शब्द दो – दो अर्थ दे रहे हैं। दीपक बारे (जलाने) पर और कुपुत्र बारे (बाल्यकाल) में उजाला करता है। ऐसे ही दीपक बढे ( बुझ जाने पर ) और कुपुत्र बढे ( बड़े होने पर ) अंधेरा करता है। इस दोहे में ‘ बारे ‘ और ‘ बढे ‘ शब्द बिना तोड़-मरोड़ ही दो – दो अर्थों की प्रतीति करा रहा है। अतः अभंगपद श्लेष अलंकार है।
श्लेष अलंकार के अन्य उदाहरण
- सुवर्ण को ढूँढत फिरत कवी , व्यभिचारी ,चोर। ( सुवर्ण – सुंदरी , सुवर्ण – सोना )
- रहिमन पानी राखिये , बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे , मोती मानुष , चून। । ( पानी के अर्थ है – चमक , इज्जत , जल )
- विपुल घन अनेकों रत्न हो साथ लाए। प्रियतम बतला दो लाल मेरा कहां है। । ( ‘ लाल ‘ शब्द के दो अर्थ हैं – पुत्र , मणि )
- मधुबन की छाती को देखो , सूखी कितनी इसकी कलियां। । ( कलियां १ खिलने से पूर्व फूल की दशा। २ योवन पूर्व की अवस्था )
- मेरी भव बाधा हरो ,राधा नागरी सोय , जा तन की झाई परे , श्याम हरित दुति होय। ( हरित – हर लेना , हर्षित होना ,हरा रंग का होना। )
अर्थालंकार ( Arthalankar )
जब किसी कविता में सौंदर्य और विशिष्टता किसी अर्थ के कारण हो तो वहां अर्थालंकार होता है।
उदाहरण के लिए –
‘ चट्टान जैसे भारी स्वर ‘
इस उदाहरण में चट्टान जैसे के अर्थ के कारण चमत्कार उत्पन्न हुआ है। यदि इसके स्थान पर ‘ शीला ‘ जैसे शब्द रख दिए जाएं तो भी अर्थ में अधिक अंतर नहीं आएगा। इसलिए इस काव्य पंक्ति में अर्थालंकार का प्रयोग हुआ है।
Alankar kitne prakar ke hote hain?
कभी-कभी शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों के योग से काव्य में चमत्कार आता है उसे ‘ उभयालंकार ‘ कहते हैं।
अर्थालंकार के प्रकार:-
अर्थालंकार के आठ मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:
उपमा ( Upma ) अलंकार
जहां किसी कविता या काव्य में एक वस्तु या प्राणी की तुलना अत्यंत समानता के कारण किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है।’ तो वहा उपमा अलंकार होता हैं।
उपमा का अर्थ है – तुलना।
जहां उपमान से उपमेय की साधारण धर्म (क्रिया को लेकर वाचक शब्द के द्वारा तुलना की जाती है )
इस को समझने के लिए उपमा के चार अंगो पर विचार करना बहुत आवश्यक है।
- उपमेय अलंकार, ( प्रत्यक्ष /प्रस्तुत ):- वस्तु या प्राणी जिसकी उपमा दी जा सके अथवा काव्य में जिसका वर्णन अपेक्षित हो उपमेय कहलाती है। मुख ,मन ,कमल ,आदि
- उपमान ,( अप्रत्यक्ष / अप्रस्तुत ):- वह प्रसिद्ध बिन्दु या प्राणी जिसके साथ उपमेय की तुलना की जाये उपमान कहलाता है – छान ,पीपर ,पात आदि
- साधारण कर्म:- उपमान तथा उपमेय में पाया जाने वाला परस्पर ” समान गुण ” साधारण धर्म कहलाता है जैसे – चाँद सा सुन्दर मुख
- सादृश्य वाचक शब्द:- जिस शब्द विशेष से समानता या उपमा का बोध होता है उसे वाचक शब्द कहलाते है। जैसे – सम , सी , सा , सरिस , आदि शब्द वाचक शब्द कहलाते है।
उपमा अलंकार के भेद –
- पूर्णोपमा – जहां उपमा के चारों अंग ( उपमेय , उपमान , समान धर्म , तथा वाचक शब्द ) विद्यमान हो , वहां पूर्णोपमा होती है।
- लुप्तोपमा – जहां उपमा के चारों अंगों में से कोई एक , दो या तीन अंग लुप्त हो वहां लुप्तोपमा होती है।
- मालोपमा – जब किसी उपमेय की उपमा कई उपमानों से की जाती है , और इस प्रकार उपमा की माला – सी बन जाती है , तब मालोपमा मानी जाती है।
उपमा अलंकार के उदाहरण:-
‘ उसका मुख चंद्रमा के समान है ‘ –
इस कथन में ‘ मुख ‘ रूप में है ‘ चंद्रमा ‘ उपमान है।’ सुंदर ‘ समान धर्म है और ‘ समान ‘ वाचक शब्द है।
‘ नील गगन – सा शांत हृदय था हो रहा। –
इस काव्य पंक्ति में उपमा के चार अंग ( उपमेय – हृदय , उपमान – नील गगन , समान धर्म – शांत और वाचक शब्द सा ) विद्यमान है। अतः यह पूर्णोपमा है।
‘ कोटी कुलिस सम वचन तुम्हारा ‘ –
इस काव्य पंक्ति में उपमा के तीन अंग ( उपमेय – वचन , उपमान -कुलिश और वाचक – सम विद्यमान है , किंतु समान धर्म का लोप है।) अतः यह लुप्तोपमा का उदाहरण है। इसे ‘ धर्मलुप्ता ‘ लुप्तोपमा कहेंगे।
‘ हिरनी से मीन से , सुखंजन समान चारु , अमल कमल से , विलोचन तिहारे हैं। ‘
‘ नेत्र ‘ उपमेय के लिए कई उपमान प्रस्तुत किए गए हैं , अतः यहां मालोपमा अलंकार है।
रूपक ( Rupak ) अलंकार
जहाँ पर उपमेय और उपमान में कोई अंतर न दिखाई दे वहाँ रूपक अलंकार होता है अथार्त जहाँ पर उपमेय और उपमान के बीच के भेद को समाप्त करके उसे एक कर दिया जाता है वहाँ पर रूपक अलंकार होता है।
मैया मै तो चंद्र खिलोना लेहों।
यहाँ चन्द्रमा उपमेय / प्रस्तुत अलंकार है ,खिलौना उपमान / अप्रस्तुत अलंकार है।
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रूपक अलंकार के भेद :-
- सम रूपक अलंकार
- अधिक रूपक अलंकार
- न्यून रूपक अलंकार
सम रूपक अलंकार क्या होता है :-
इसमें उपमेय और उपमान में समानता दिखाई जाती है वहाँ पर सम रूपक अलंकार होता है।
बीती विभावरी जागरी. अम्बर – पनघट में डुबा रही, तारघट उषा – नागरी।
तारा – उपमेय / प्रस्तुत अलंकार
घट – उपमान / अप्रस्तुत अलंकार।
अधिक रूपक अलंकार क्या होता है :-
जहाँ पर उपमेय में उपमान की तुलना में कुछ न्यूनता का बोध होता है वहाँ पर अधिक रूपक अलंकार होता है।
अधिक रूपक अलंकार क्या होता है :-
इसमें उपमान की तुलना में उपमेय को न्यून दिखाया जाता है वहाँ पर न्यून रूपक अलंकार होता है।
जनम सिन्धु विष बन्धु पुनि, दीन मलिन सकलंक
सिय मुख समता पावकिमि चन्द्र बापुरो रंक।।
उत्प्रेक्षा ( Utpreksha ) अलंकार
जहां रूप , गुण आदि समानता के कारण उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
इसके वाचक शब्द -> मनु , मानो ,ज्यों ,जानो ,जानहु, आदि
कहती हुई यो उतरा के नेत्र जल से भर गए।
हिम के कणो से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए। ।
उतरा के नेत्र – उपमेय / प्रस्तुत अलंकार है।
ओस युक्त जल – कण पंकज – उपमान / अप्रस्तुत अलंकार है।
उत्प्रेक्षा अलंकार के भेद :-
उत्प्रेक्षा अलंकार के चार भेद हैं:-
- वस्तुप्रेक्षा
- हेतुप्रेक्षा
- फलोत्प्रेक्षा
- लूपोत्प्रेक्षा
वस्तुप्रेक्षा अलंकार क्या होता है :
वस्तुप्रेक्षा अलंकार के अंतर्गत किसी रूप में वस्तु में उपमान की संभावना का ज्ञान होता है जैसे मुख मानो चंद्रमा है अतः यहां पर संभावना की जा रही है।
हेतुप्रेक्षा अलंकार क्या होता है :
इसके अंतर्गत वाक्य में संभावना, कारण, हेतु का ज्ञान होता है।
Alankar ka mahattva In Hindi
फलोत्प्रेक्षा अलंकार क्या होता है :
जहां कर्म किसी फल के उद्देश्य या उसकी प्राप्ति के लिए किया जाता है वहां फलोत्प्रेक्षा माना जाता है।
लूपोत्प्रेक्षा अलंकार क्या होता है :
जहां संभावना प्रकट की जाती हो जिसके लिए मानो, जानो, मनु. जनु, जानहु जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है वहां लूपोत्प्रेक्ष होता है।
दृष्टान्त ( Drishtant ) अलंकार
जहाँ दो सामान्य या दोनों विशेष वाक्यों में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव होता हो वहाँ पर दृष्टान्त अलंकार होता है। इस अलंकार में उपमेय रूप में कहीं गई बात से मिलती-जुलती बात उपमान रूप में दुसरे वाक्य में होती है। यह अलंकार उभयालंकार का भी एक अंग है।
‘जो रहीम उत्तम प्रकृति का कर सकत कुसंग
चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग ।’
स्पष्टीकरण – जो मनुष्य उत्तम प्रकृति का होता है उस पर कोई दुष्ट व्यक्ति का प्रभाव नहीं पड़ता है। जिस प्रकार चंदन के वृक्ष पर विषधारी सर्प लिपटे रहते हैं किंतु उसकी सुगंध पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। यहां पर पहली पंक्ति बात को दूसरी पंक्ति के उदाहरण के साथ प्रस्तुत किया गया अतः यहां दृष्टांत अलंकार है।
संदेह ( Sandeh ) अलंकार
जब उपमेय और उपमान में समता देखकर यह निश्चय नहीं हो पाता कि उपमान वास्तव में उपमेय है या नहीं। जब यह दुविधा बनती है , तब संदेह अलंकार होता है अथार्त जहाँ पर किसी व्यक्ति या वस्तु को देखकर संशय बना रहे वहाँ संदेह अलंकार होता है। यह अलंकार उभयालंकार का भी एक अंग है।
सारी बीच नारी है, कि नारी बीच सारी है ।
कि सारी है की नारी है, कि नारी है की सारी है ।|
स्पष्टीकरण – नारी के बीच साड़ी है या साड़ी के बीच नारी है इसका निश्चय नहीं हो रहा। अतः यहाँ पर संदेह बना हुआ है इसीलिए यहाँ संदेह अलंकार है।
अतिश्योक्ति ( Atishyokti ) अलंकार
जब किसी व्यक्ति या वस्तु का वर्णन करने में लोक समाज की सीमा या मर्यादा टूट जाये उसे अतिश्योक्ति अलंकार कहते हैं अथार्त जब किसी वस्तु का बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाये वहां पर अतिश्योक्ति अलंकार होता है।
हनुमान की पूंछ में लगन न पायी आगि।
सगरी लंका जल गई, गये निसाचर भागि।
स्पष्टीकरण – यहाँ हनुमान की पूंछ में आग लगने के पहले ही सारी लंका का जलना और राक्षसों के भागने का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन होने से अतिशयोक्ति अलंकार है।
उपमेयोपमा ( Upmeyopma ) अलंकार
इस अलंकार में उपमेय और उपमान को परस्पर उपमान और उपमेय बनाने की कोशिश की जाती है इसमें उपमेय और उपमान की एक दूसरे से उपमा दी जाती है।
तौ मुख सोहत है ससि सो अरु सोहत है ससि तो मुख जैसो
स्पष्टीकरण – उपर दिए गए वाक्य में दो उपमाएँ एक साथ आयी है, पर दोनों उपमाओं के उपमेय और उपमान क्रमशः उपमान और उपमेय में परिवर्तित हो गये है।
प्रतीप ( Prateep ) अलंकार
प्रतीप का अर्थ है – “उल्टा” या विपरीत, जहाँ बड़े को छोटा और छोटे को बड़ा बताया जाता है, अर्थात जब उपमेय को उपमान और उपमान को उपमेय बना दिया जाता है, तब वहाँ Prateep Alankar होता है।
यह उपमा अलंकार का उल्टा होता है क्योंकि इस अलंकार में उपमान को लज्जित, पराजित या नीचा दिखाया जाता है और उपमेय को श्रेष्ट बताया जाता है।
“सिय मुख समता किमि करै चंद वापुरो रंक।”
स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में सीताजी के मुख (उपमेय) की तुलना बेचारा चन्द्रमा (उपमान) नहीं कर सकता। उपमेय (सीताजी) को श्रेष्ठ बताया है इसलिए यह प्रतीप अलंकार है।
अनन्वय ( Ananvya ) अलंकार
जहाँ उपमेय की तुलना करने के लिए कोई उपमान न हो और उपमेय को ही उपमान बना दिया जाता है, तब वहाँ ‘अनन्वय अलंकार’ होता है।
मुख मुख ही के समान सुंदर है।
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त पंक्तियों में ‘मुख’ उपमेय है और ‘मुख’ ही को उपमान बना दिया। अर्थात ‘मुख’ को ‘मुख’ से ही उपमा दी गयी है।
भ्रांतिमान ( Bhrantiman ) अलंकार
जब उपमेय को भ्रमवश उपमान समझ लिया जाता है अर्थात उपमेय में उपमान का धोखा हो जाता है, तब वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है।
मुन्ना तब मम्मी के सिर पर देख-देख दो चोटी,
भाग उठा भय मानकर सिर पर साँपिन लोटी।
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त पंक्तियों में बच्चा अपनी माँ की चोटियों को सापिन समझ कर डर जाता है मतलब उसे भ्रम होता है इसलिए यहाँ भ्रांतिमान अलंकार है।
दीपक ( Deepak ) अलंकार
जहाँ पर प्रस्तुत और अप्रस्तुत का एक ही धर्म स्थापित किया जाता है वहाँ पर दीपक अलंकार होता है।
’’भूपति सोहत दान सों, फल फूलन उद्यान।’’
स्पष्टीकरण – यहाँ भूपति (प्रस्तुत) और उद्यान (अप्रस्तुत) दोनों के लिए एक ही साधारण धर्म (सोहत) का प्रयोग हुआ है, अतः यहाँ दीपक अलंकार है।
अपहृति अलंकार
अपहृति का अर्थ होता है छिपाव। जब किसी सत्य बात या वस्तु को छिपाकर उसके स्थान पर किसी झूठी वस्तु की स्थापना की जाती है वहाँ अपहृति अलंकार होता है। यह अलंकार उभयालंकार का भी एक अंग है।
“सुनहु नाथ रघुवीर कृपाला,
बन्धु न होय मोर यह काला।”
व्यतिरेक ( Vyatirek ) अलंकार
जब छोटे को बड़े से श्रेष्ठ बताया जाता है और उसका कारण भी दिया जाता है अर्थात जब उपमेय को उपमान की अपेक्षा बढ़कर बताया जाता है, तब वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है।
साधु ऊँचे शैल सम, प्रकृति सुकुमार।
विभावना ( Vibhavana ) अलंकार
बिना कारण के काम हो जाना अर्थात जहाँ किसी कार्य कारण के सम्बंध में कोई विलक्षण बात कही जाती है, तब वहाँ विभावना अलंकार होता है। कारण के अभाव में कार्य का होना बताया जाता है।
जहाँ बिना कारण के कार्य का होना पाया जाए वहाँ विभावना अलंकार होता है।
बिनु पग चलै सुनै बिनु काना।
कर बिनु कर्म करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी।
विशेषोक्ति ( Visheshokti ) अलंकार
कारण के उपस्थित होने पर भी कार्य ना होने की दशा में विशेषोक्ति अलंकार माना जाता है।
‘नीर भरे निसिदिन रहें तऊ न प्यास बुझय।’
इस पंक्ति में प्यास बुझाने का कारण नीर उपस्थित है पर प्यास बुझाने का कार्य नहीं हो पा रहा है। अतः यहां विशेषोक्ति अलंकार है।
अर्थान्तरन्यास ( Vyatirek ) अलंकार
जब किसी सामान्य कथन से विशेष कथन का अथवा विशेष कथन से सामान्य कथन का समर्थन किया जाये वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है।
बड़े न हूजे गुनन बिनु, बिरद बड़ाई पाय।
कहत धतूरे सों कनक, गहनो गढ़ो न जाय।
यहाँ सामान्य कथन का समर्थन विशेष बात से किया गया है। पहले वाक्य में सामान्य बात कही गयी है और उसका समर्थन विशेष बात कहकर किया गया है।
उल्लेख ( Ullekh) अलंकार
किसी वस्तु का अनेक प्रकार से वर्णन करना, उल्लेख अलंकार ( Ullekh Alankar ) होता है।
साधुन को सुखदानि हैं दुर्जनगन दुख दानि।
बैरिन विक्रम-हानि-प्रद राम, तिहरे पानि।
विरोधाभाष ( Virodhabhash ) अलंकार
जब किसी वस्तु का वर्णन करने पर विरोध न होते हुए भी विरोध का आभाष हो वहाँ पर विरोधाभास अलंकार होता है।
‘आग हूँ जिससे ढुलकते बिंदु हिमजल के।
शून्य हूँ जिसमें बिछे हैं पांवड़े पलकें।’
असंगति ( Asangati ) अलंकार
जहाँ आपतात: विरोध दृष्टिगत होते हुए, कार्य और कारण का वैयाधिकरन्य रणित हो वहाँ पर असंगति अलंकार होता है।
“ह्रदय घाव मेरे पीर रघुवीरै।”
मानवीकरण ( Manvikaran ) अलंकार
जहाँ पर काव्य में जड़ में चेतन का आरोप होता है वहाँ पर मानवीकरण अलंकार होता है अथार्त जहाँ जड़ प्रकृति पर मानवीय भावनाओं और क्रियांओं का आरोप हो वहाँ पर मानवीकरण अलंकार होता है। जब प्रकृति के द्वारा निर्मित चीजों में मानवीय भावनाओं के होने का वर्णन किया जाए वहां पर मानवीकरण अलंकार होता है।
बीती विभावरी जागरी, अम्बर पनघट में डुबो रही तास घट उषा नगरी।
अन्योक्ति ( Anyokti ) अलंकार
जहाँ पर किसी उक्ति के माध्यम से किसी अन्य को कोई बात कही जाए वहाँ पर अन्योक्ति अलंकार होता है।
जब किसी अप्रस्तुत माध्यम से किसी प्रस्तुत (सच्चाई) का बोध कराया जाता है, तब वहाँ ‘अन्योक्ति अलंकार’ होता है।
फूलों के आस-पास रहते हैं, फिर भी काँटे उदास रहते हैं।
उभयालंकार ( Ubhayalankar)
जो अलंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आधारित रहकर दोनों को चमत्कारी करते हैं वहाँ उभयालंकार होता है।
‘कजरारी अंखियन में कजरारी न लखाय।’

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